त्योहार से पहले कोरोगेटेड बाक्स उद्योग पर दोहरी मार, एक हफ्ते में दो बार बढ़े दाम, तीसरी बार की चेतावनी
ग्रेटर नोएडा।
त्योहारी सीजन शुरू होने से ठीक पहले पेपर मिल मालिकों ने कोरोगेटेड बाक्स उद्योग को तगड़ा झटका दिया है। एक ही हफ्ते में दो बार दाम बढ़ाए जा चुके हैं, और अब तीसरी बार एक रुपये प्रति किलो दाम बढ़ाने की चेतावनी भी जारी हो गई है, जो सोमवार से लागू होगी।
दिलचस्प और चिंताजनक बात यह है कि मिल मालिकों ने अब तक करीब सात रुपये प्रति किलो तक रेट बढ़ा दिए हैं — यानी इतने कम समय में इतनी बड़ी बढ़ोतरी कि पूरे उद्योग का संतुलन ही बिगड़ने लगा है। इसका सीधा असर जिले के 6 हजार से ज्यादा कोरोगेटेड बाक्स से जुड़े उद्यमियों और निर्यातकों पर पड़ रहा है।
जिले का कारोबार कितना बड़ा है?
अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिले में हर महीने करीब 250 करोड़ रुपये से ज्यादा का कोरोगेटेड बाक्स कारोबार सिर्फ पैकेजिंग मटेरियल के रूप में होता है, और इसमें से 25-30 करोड़ रुपये का माल सीधे अमेरिका और ब्रिटेन को निर्यात होता है। ऐसे में दामों में यह उथल-पुथल सिर्फ स्थानीय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर्स पर भी असर डाल रही है।
GST की उलझन ने बढ़ाई मुसीबत
सबसे पेचीदा हिस्सा यही है — कोरोगेटेड पेपरबोर्ड बाक्स पर GST दर 12% से घटाकर 5% कर दी गई, लेकिन इसके मुख्य कच्चे माल, क्राफ्ट पेपर पर GST उल्टा 12% से बढ़कर 18% हो गया। इनपुट और आउटपुट GST दरों के इस उलटफेर से इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) लंबे समय तक अटका रह जाता है, जिससे खासकर छोटे निर्माताओं की वर्किंग कैपिटल सीधे तौर पर प्रभावित होती है।
उप्र कोरोगेटेड बॉक्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष एसके चौहान के मुताबिक, मानक क्राफ्ट पेपर की कीमतों में करीब 25 से 30 प्रतिशत तक की वृद्धि हो चुकी है, और हाई बीएफ क्राफ्ट पेपर की कीमतें भी उछल चुकी हैं। उनका कहना है कि अगस्त-सितंबर के दौरान पेपर मिलों की लगातार साप्ताहिक मूल्य वृद्धि ने पहले से कम मार्जिन पर काम कर रहे बॉक्स निर्माताओं पर लागत का दबाव और बढ़ा दिया है।
अब 60 दिन नहीं, सिर्फ 7 दिन में भुगतान
आईबीए अध्यक्ष अमित उपाध्याय ने एक और परेशानी की ओर इशारा किया — पेपर सप्लायर्स पहले 30 से 60 दिन तक का क्रेडिट देते थे, लेकिन अब सिर्फ सात दिन के भीतर भुगतान मांग रहे हैं। जबकि दूसरी तरफ, बॉक्स निर्माताओं को अपने ग्राहकों से भुगतान में देरी झेलनी पड़ रही है। नतीजा — खरीद और बिक्री के बीच नकदी का अंतर लगातार बढ़ रहा है, और इसका सीधा असर छोटी इकाइयों की वर्किंग कैपिटल पर पड़ रहा है।
सिर्फ पेपर नहीं, बाकी कच्चा माल भी महंगा
डीएलजेएम ग्रुप के असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट प्रवीण रमन बताते हैं कि पिछले डेढ़-दो महीनों में क्राफ्ट पेपर के साथ-साथ पॉलिमर, प्लास्टिक दाना, स्टील, तांबा और एल्युमिनियम जैसे कच्चे माल के दाम भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं — यानी एमएसएमई सेक्टर पर दोहरी मार पड़ रही है।
केबी कंपोनेंट्स लिमिटेड के असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट देवेंद्र शर्मा के मुताबिक, उनकी इकाई में हर महीने 20-22 लाख रुपये का पैकेजिंग मटेरियल इस्तेमाल होता है, जिसमें 15 लाख रुपये के कोरोगेटेड बॉक्स शामिल हैं। परेशानी यह है कि उन्होंने ग्राहकों के साथ 3 से 6 महीने के ऑर्डर पहले से पुराने रेट पर बुक कर रखे हैं — ऐसे में बढ़ी हुई लागत के बीच सप्लाई चेन बनाए रखना अब मुश्किल होता जा रहा है।
निर्यातकों की सांसें भी अटकीं
जो उद्यमी अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों को मोनो कार्टन, हैंडमेड पेपर बैग, बटर पेपर और पेपर पाउच जैसे उत्पाद निर्यात करते हैं, उनकी मुश्किल अलग है। कच्चे माल और पेपर के दामों में बनी अनिश्चितता के चलते अब उनके लिए समय पर ऑर्डर पूरा करना भी चुनौती बन गया है।

